मंड की पहचान।
मंड आयोडीन से नीला-काला होता है। यही रंग हरे भाग में आता है।
कक्षा 10 · विज्ञान · अध्याय 5 · बिहार बोर्ड (BSEB)CBSE · NCERT 2026-27
Life Processes
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1. पढ़ो — क्रियाकलाप 5.1 से 5.8, चित्र, हल उदाहरण, बोर्ड टिप
2. जाँचो — हर पाठ के अपने प्रश्न; संख्या पाठ के हिसाब से
3. महारत ★ — उस पाठ के सब सही। गलत वाले «दोबारा करो»
4. प्रकाश-संश्लेषण के समीकरण वाला चित्र देखो — 6CO2 + 6H2O से ग्लूकोज और 6O2
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Nutrition and the starch test — Activity 5.1 · NCERT 5.1–5.2 · क्रियाकलाप 5.1
कुत्ता सो रहा हो तो भी हम उसे जीवित मानते हैं, क्योंकि साँस चल रही है। केवल दिखने वाली गति काफी नहीं। विषाणु में स्वयं कोई आणविक गति नहीं होती जब तक वह किसी कोशिका को न घेरे। इसलिए उन पर विवाद है।
शरीर की मरम्मत रुक जाए तो व्यवस्था टूटती है। इस मरम्मत को जैव प्रक्रम कहते हैं। बाहर से ऊर्जा भोजन के रूप में आती है — यही पोषण है। भोजन तोड़ने के लिए कई जीव ऑक्सीजन लेते हैं — यही श्वसन है। बहुकोशिकीय शरीर में हर कोशिका सतह को नहीं छूती, इसलिए परिवहन चाहिए। हानिकारक अपशिष्ट निकालना उत्सर्जन है।
हरे पौधे और कुछ जीवाणु स्वपोषी हैं। वे CO2 और जल से भोजन बनाते हैं। जंतु और कवक परपोषी हैं। वे जटिल भोजन एंजाइम से तोड़ते हैं।
क्लोरोफिल प्रकाश सोखता है। प्रकाश की ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा बनती है और जल हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में टूटता है। फिर कार्बन डाइऑक्साइड कार्बोहाइड्रेट में बदलती है। ये तीनों कदम एक ही पल में पूरे हों, यह ज़रूरी नहीं। रेगिस्तानी पौधे रात को CO2 लेकर एक मध्यवर्ती बनाते हैं और दिन को प्रकाश की ऊर्जा लगाते हैं।
पत्ती की काट में हरे बिंदु हरितलवक हैं। उन्हीं में क्लोरोफिल है।
ऐल्कोहॉल ज्वलनशील है। बीकर को सीधी लौ पर मत रखना। जल-ऊष्मक में गर्म करो, जब तक ऐल्कोहॉल उबलने लगे।
मनीप्लांट या क्रोटन जैसा चितकबरा पौधा तीन दिन अँधेरे कमरे में रखो, ताकि पुराना मंड खर्च हो जाए। फिर लगभग छह घंटे धूप दो। एक पत्ती तोड़ो। हरे भाग कागज पर उतार लो। पत्ती को कुछ मिनट उबलते जल में डुबोओ। फिर ऐल्कोहॉल में डालो।
पत्ती का हरा रंग ऐल्कोहॉल में उतर आता है और पत्ती फीकी हो जाती है। अब तनु आयोडीन में डुबोओ। जहाँ क्लोरोफिल था, वहाँ पत्ती नीली-काली होती है। फीके भाग में मंड नहीं बनता। निष्कर्ष: मंड बनने के लिए क्लोरोफिल चाहिए।
किताब का जार-परीक्षण कार्बन डाइऑक्साइड की ज़रूरत दिखाता है। दो पौधे तीन दिन अँधेरे में रखो। एक के पास वॉच-ग्लास में पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड रखो, जो CO2 सोख लेता है। दोनों पर घंटाकार जार और वैसलीन से हवा बंद करो। दो घंटे धूप के बाद मंड जाँचो। KOH वाले पौधे में मंड नहीं बनता।
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.1 में पत्ती को पहले अँधेरे में क्यों रखते हैं?
उत्तर: पत्ती में पहले से जमा मंड हो तो आयोडीन हर जगह नीला-काला कर देगा। तीन दिन के अँधेरे में वह मंड खर्च हो जाता है। उसके बाद जो नीला-काला रंग आए, वह नई धूप में बने मंड का है।
वस्तुनिष्ठ में मंड की पहचान आयोडीन है। रंग नीला-काला है, लाल नहीं।
CBSE तीन दिन के अँधेरे का कारण पूछता है। लिखो: पुराना मंड हटाना, ताकि नया मंड पहचाना जा सके।
मंड की पहचान।
मंड आयोडीन से नीला-काला होता है। यही रंग हरे भाग में आता है।
गलत — यह स्वपोषी का काम है। परपोषी तैयार जटिल भोजन लेते हैं।
आयोडीन वाला परीक्षण।
पौधे अतिरिक्त भोजन मंड बनाकर रखते हैं।
जिस पौधे के पास KOH है, उसमें मंड नहीं बनता।
KOH कार्बन डाइऑक्साइड सोख लेता है, इसलिए प्रकाश-संश्लेषण रुक जाता है।
हर कोशिका बाहरी वातावरण को नहीं छूती। अंदर की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन केवल विसरण से समय पर नहीं पहुँचती। इसलिए विशेष अंग और परिवहन चाहिए।
Sunlight is essential — Activity 5.2 · NCERT 5.2 · क्रियाकलाप 5.2
किताब पूछती है: ऊपर के दो परीक्षणों के बाद क्या हम ऐसा प्रयोग बना सकते हैं जो दिखाए कि प्रकाश-संश्लेषण के लिए धूप ज़रूरी है?
एक स्वस्थ पौधा तीन दिन अँधेरे में रखो। एक पत्ती का कुछ भाग काले कागज से ढक दो, शेष खुला रहे। पौधे को कुछ घंटे धूप दो। पत्ती तोड़कर क्रियाकलाप 5.1 की तरह मंड जाँचो।
खुला हरा भाग नीला-काला होता है। ढका भाग नहीं। अतः मंड बनने के लिए सूर्य का प्रकाश आवश्यक है।
पत्ती पर सूक्ष्म छिद्र रंध्र हैं। इन्हीं से गैसों का बड़ा आदान-प्रदान होता है। जल भी यहीं से खो सकता है, इसलिए CO2 की जरूरत न हो तो रंध्र बंद हो जाते हैं। द्वार कोशिकाएँ फूलें तो छिद्र खुलता है। सिकुड़ें तो बंद होता है। गैस का आदान-प्रदान तने और जड़ की सतह से भी होता है।
जल जड़ें मिट्टी से लेती हैं। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, लोहा और मैग्नीशियम भी मिट्टी से आते हैं। नाइट्रोजन प्रोटीन बनाने के लिए ज़रूरी है। वह नाइट्रेट या नाइट्राइट के रूप में आती है, या जीवाणु वायु की नाइट्रोजन से जो यौगिक बनाएँ उन्हें पौधे ले लेते हैं।
प्रश्न: काला कागज हटाने के बाद पत्ती के दोनों भागों में आयोडीन का रंग अलग क्यों है?
उत्तर: खुले भाग को धूप और क्लोरोफिल दोनों मिले, इसलिए वहाँ मंड बना और आयोडीन ने उसे नीला-काला किया। ढके भाग को धूप नहीं मिली, मंड नहीं बना, रंग नहीं बदला। अंतर केवल प्रकाश का है।
वस्तुनिष्ठ में काला कागज धूप रोकता है, कार्बन डाइऑक्साइड नहीं। CO2 रोकने का काम KOH का है।
CBSE नियंत्रण भी पूछता है। लिखो: दोनों भाग एक ही पत्ती के हैं, अंतर केवल ढकने का है।
ढका भाग नीला-काला नहीं होता।
काला कागज धूप रोकता है। बिना धूप मंड नहीं बनता।
सही — कोशिका सिकुड़े तो छिद्र बंद हो जाता है।
द्वार कोशिकाएँ इन्हें खोलती हैं।
इन छिद्रों का नाम रंध्र है।
खनिज भी उसी रास्ते आते हैं।
जल मिट्टी से जड़ों द्वारा लिया जाता है।
गलत — कई रेगिस्तानी पौधे रात को CO2 लेकर मध्यवर्ती बनाते हैं और दिन को प्रकाश लगाते हैं।
नाइट्रोजन प्रोटीन और अन्य यौगिक बनाने के लिए ज़रूरी है। वह मिट्टी से नाइट्रेट या नाइट्राइट के रूप में आती है, या जीवाणुओं द्वारा वायु से बनाए यौगिकों के रूप में।
Saliva and starch — Activity 5.3 · NCERT 5.2.2–5.2.4 · क्रियाकलाप 5.3
कवक, जैसे ब्रेड की फफूँद, यीस्ट और मशरूम, भोजन शरीर के बाहर पचाकर सोखते हैं। अमरबेल, किलनी, जूँ, जोंक और फीताकृमि दूसरे जीव पर पलते हैं, उसे मारे बिना। यह परजीवी पोषण है।
अमीबा अस्थायी पादों से भोजन समेटकर खाद्य रसधानी बनाता है। पचा भोजन कोशिकाद्रव्य में चला जाता है, बचा भाग सतह से बाहर फेंक दिया जाता है। पैरामीशियम का आकार निश्चित है। पक्ष्माभ भोजन को एक निश्चित स्थान तक ले जाते हैं।
दो परखनलियों A और B में 1 mL एक प्रतिशत मंड घोल लो। केवल A में 1 mL लार डालो। दोनों को 20–30 मिनट चुप छोड़ दो। फिर दोनों में तनु आयोडीन की कुछ बूँदें डालो।
B में नीला-काला रंग आता है, क्योंकि मंड बचा है। A में यह रंग नहीं आता। लार का एंजाइम लार-एमिलेस मंड को सरल शर्करा में तोड़ चुका है।
दाँत भोजन पीसते हैं। लार उसे गीला करती है, ताकि नली की मुलायम दीवार न छिले। जीभ निवाला घुमाती है। आहार नाल की पेशियाँ लहर की तरह सिकुड़कर भोजन को आगे बढ़ाती हैं। इसी को क्रमाकुंचन कहते हैं।
प्रश्न: क्रियाकलाप 5.3 में नली B क्यों रखी जाती है?
उत्तर: B में लार नहीं है। वह नियंत्रण है। अगर B भी नीली-काली न हो तो हम नहीं कह सकते कि रंग मिटाने का काम लार ने किया। B नीली-काली रहती है और A नहीं, इसलिए अंतर लार का है।
वस्तुनिष्ठ में मंड तोड़ने वाला एंजाइम लार-एमिलेस है, पेप्सिन नहीं। पेप्सिन प्रोटीन का है।
CBSE नियंत्रण नली पूछता है। लिखो: B बिना लार के दिखाती है कि मंड अपने आप नहीं मिटा।
लार मंड तोड़ देती है।
B में मंड बचा रहता है, इसलिए रंग नीला-काला होता है। A में मंड शर्करा बन चुका है।
सही — वह दूसरे पौधे से भोजन लेती है, उसे मारे बिना।
अंग्रेज़ी salivary amylase।
यह एंजाइम लार-एमिलेस है।
अस्थायी पाद भोजन को घेरते हैं। खाद्य रसधानी बनती है। पचा भोजन कोशिकाद्रव्य में चला जाता है। अपचित भाग सतह से बाहर फेंक दिया जाता है।
From the stomach to the intestine · NCERT 5.2.4 · मानव पाचन
ग्रासनाल भोजन को आमाशय तक ले जाती है। आमाशय की जठर ग्रंथियाँ हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन और श्लेष्मा छोड़ती हैं। अम्ल माध्यम पेप्सिन के लिए बनता है और भोजन के कीटाणु मरते हैं। श्लेष्मा दीवार को अम्ल से बचाती है। सुरक्षा हटे तो अम्लता की जलन होती है।
आमाशय का निर्गम एक अवरोधिनी छोटी मात्रा में भोजन को छोटी आँत में छोड़ता है। घास खाने वाले जीवों की छोटी आँत लंबी होती है, क्योंकि सेलुलोज देर से पचता है। बाघ जैसी मांसाहारी आँत छोटी होती है।
आमाशय से आया भोजन अम्लीय है। अग्न्याशय के एंजाइम क्षारीय माध्यम चाहते हैं। यकृत का पित्त माध्यम क्षारीय बनाता है और वसा की बड़ी बूँदों को छोटी बूँदों में बाँटता है, जैसे साबुन तेल को बाँटता है। अग्न्याशय रस में ट्रिप्सिन प्रोटीन पचाता है और लाइपेज वसा। आँत्र रस प्रोटीन को अमीनो अम्ल, कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज और वसा को वसा अम्ल तथा ग्लिसरॉल बनाता है।
छोटी आँत की भीतरी दीवार पर अँगुली जैसे रसांकुर क्षेत्रफल बढ़ाते हैं। इनमें रक्त वाहिकाएँ हैं, जो पचा भोजन हर कोशिका तक ले जाती हैं। बड़ी आँत जल सोखती है। बचा अपशिष्ट गुदा से बाहर जाता है। दाँतों पर बैक्टीरिया शर्करा से अम्ल बनाते हैं। प्लाक के नीचे लार अम्ल को बेअसर नहीं कर पाती। खाने के बाद ब्रश करने से प्लाक हटता है।
प्रश्न: पित्त वसा को एंजाइम कैसे नहीं पचाता, फिर भी ज़रूरी क्यों है?
उत्तर: पित्त में वसा तोड़ने वाला एंजाइम नहीं है। वह बूँदों को छोटा करके उनका क्षेत्रफल बढ़ाता है। तब लाइपेज हर बूँद पर आसानी से काम करता है। साथ ही वह अम्लीय भोजन को क्षारीय करता है।
वस्तुनिष्ठ में ट्रिप्सिन प्रोटीन का है, एमिलेस मंड का, लाइपेज वसा का। तीनों को आपस में मत बदलना।
CBSE पित्त के दो काम पूछता है। केवल «वसा पचाता है» मत लिखना। लिखो: क्षारीय माध्यम और बूँदों को छोटा करना।
अम्लीय माध्यम इसी के लिए है।
पेप्सिन प्रोटीन पचाता है। HCl उसका माध्यम बनाता है।
गलत — मांस जल्दी पचता है, इसलिए मांसाहारी की आँत छोटी होती है।
यकृत से आता है।
पित्त लवण वसा का पायस बनाते हैं।
ये क्षेत्रफल बढ़ाती हैं।
इन्हें रसांकुर या विलाई कहते हैं।
श्लेष्मा भीतरी दीवार को अम्ल से बचाती है। अम्ल पेप्सिन के लिए अम्लीय माध्यम बनाता है और भोजन के साथ आए कीटाणुओं को मारता है।
Lime water and yeast — Activities 5.4 and 5.5 · NCERT 5.3 · क्रियाकलाप 5.4, 5.5
ताज़ा चूने का पानी परखनली में लो और उसमें मुँह से हवा फूँको। नोट करो कि दूधिया होने में कितना समय लगा। दूसरी परखनली में पिचकारी या सिरिंज से साधारण हवा भेजो।
फूँकी हुई हवा चूने के पानी को जल्दी दूधिया करती है। साँस से निकली हवा में कार्बन डाइऑक्साइड अधिक है।
फलों के रस या शक्कर के घोल में यीस्ट मिलाओ। मिश्रण एक छेद वाले कॉर्क वाली परखनली में लो। मुड़ी नली का खुला सिरा ताज़े चूने के पानी में डुबोओ।
चूने का पानी दूधिया हो जाता है। किण्वन में कार्बन डाइऑक्साइड बनती है। यीस्ट इसी अवायवीय मार्ग में एथेनॉल भी बनाता है।
ग्लूकोज छह कार्बन का अणु है। पहला कदम कोशिका द्रव्य में होता है: ग्लूकोज तीन कार्बन वाले पायरुवेट में टूटता है।
ऑक्सीजन हो तो पायरुवेट माइटोकॉन्ड्रिया में कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनता है। यही वायवीय श्वसन है। ऊर्जा बहुत अधिक मिलती है। ऑक्सीजन न हो तो यीस्ट में पायरुवेट एथेनॉल और CO2 बनता है। यही अवायवीय श्वसन या किण्वन है। हमारी पेशी में ऑक्सीजन कम पड़े तो पायरुवेट लैक्टिक अम्ल बनता है। अचानक दौड़ने पर यही अम्ल ऐंठन देता है।
निकली ऊर्जा ADP और फॉस्फेट से ATP बनाती है। ATP का अंतिम फॉस्फेट टूटे तो लगभग 30.5 kJ/mol ऊर्जा मिलती है। ATP कोशिका की ऊर्जा-मुद्रा है। C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O
प्रश्न: यीस्ट के किण्वन का शब्द-समीकरण लिखो और क्रियाकलाप 5.5 से उसकी एक पुष्टि बताओ।
उत्तर: C6H12O6 → 2C2H5OH + 2CO2 चूने का पानी दूधिया होना CO2 की पुष्टि है। एथेनॉल दूसरा उत्पाद है। ऑक्सीजन इस मार्ग में नहीं लगती।
वस्तुनिष्ठ में पायरुवेट का वायवीय विखंडन माइटोकॉन्ड्रिया में होता है, हरितलवक में नहीं।
CBSE तीन रास्ते पूछता है: यीस्ट में एथेनॉल, पेशी में लैक्टिक अम्ल, ऑक्सीजन में CO2 और जल। जगह का नाम साथ लिखो।
10-सेकंड रिवीजन
साँस में CO2 अधिक है।
फूँकी हुई हवा में कार्बन डाइऑक्साइड अधिक है, इसलिए दूधिया रंग जल्दी आता है।
गलत — यह अवायवीय मार्ग है। उत्पाद एथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड हैं।
पहला कदम हर मार्ग से पहले यहीं होता है।
ग्लूकोज का पायरुवेट में टूटना कोशिका द्रव्य में होता है।
तीन कार्बन का अणु, ऑक्सीजन की कमी में।
ऐंठन लैक्टिक अम्ल से होती है।
कोशिका की ऊर्जा-मुद्रा।
लगभग 30.5 kJ/mol ऊर्जा मुक्त होती है।
वायवीय श्वसन में ऑक्सीजन लगती है, अवायवीय में नहीं। वायवीय पथ माइटोकॉन्ड्रिया में CO2 और जल देता है और ऊर्जा अधिक है। यीस्ट के अवायवीय किण्वन में एथेनॉल और CO2 बनते हैं और ऊर्जा कम मिलती है।
Fish gills and our lungs — Activity 5.6 · NCERT 5.3 · क्रियाकलाप 5.6
मछलीघर में मछली देखो। मुँह खुलता-बंद होता है और आँख के पीछे गलफड़-दरार या उसे ढकने वाला प्रच्छद भी खुलता-बंद होता है। दोनों की लय मिली होती है। एक मिनट में मुँह कितनी बार खुले, गिनो। अपनी साँस की गिनती से तुलना करो।
जल में घुली ऑक्सीजन हवा की ऑक्सीजन से बहुत कम है। इसलिए जलीय जीव तेज़ साँस लेते हैं। मछली मुँह से जल लेती है और उसे गलफड़ों पर से निकालती है। रक्त वहीं घुली ऑक्सीजन उठाता है।
थल के जीव वायु की ऑक्सीजन लेते हैं। नासा छिद्र के बाल और श्लेष्मा धूल रोकते हैं। गले में उपास्थि के छल्ले वायु-मार्ग को पिचकने नहीं देते। फेफड़े के अंदर नलिकाएँ गुब्बारे जैसी कूपिकाओं में खत्म होती हैं। यदि सारी कूपिकाएँ बिछा दी जाएँ तो क्षेत्रफल लगभग 80 वर्ग मीटर बनता है।
साँस लेते समय पसलियाँ उठती हैं और मध्यपट चपटा होता है। वक्ष गुहा बड़ी होती है और हवा अंदर खिंचती है। रक्त CO2 कूपिका में छोड़ता है और कूपिका की ऑक्सीजन उठाता है। फेफड़े में थोड़ी हवा सदा बची रहती है, जिसे अवशिष्ट आयतन कहते हैं, ताकि गैसों के आदान-प्रदान को समय मिले।
रात को पौधे मुख्य रूप से CO2 बाहर करते हैं। दिन को श्वसन की CO2 प्रकाश-संश्लेषण में लग जाती है और बाहर ऑक्सीजन निकलती है। तंबाकू और गुटखा मुख, फेफड़े और हृदय को नुकसान पहुँचाते हैं। धूम्रपान पक्ष्माभ नष्ट करता है, इसलिए धूल और कीटाणु फेफड़े में पहुँचते हैं।
प्रश्न: मछली की साँस हमारी साँस से तेज़ क्यों होती है?
उत्तर: पानी में घुली ऑक्सीजन वायु की ऑक्सीजन से कम होती है। जरूरत पूरी करने के लिए मछली को अधिक जल गलफड़ों पर से गुजारना पड़ता है। इसलिए मुँह और प्रच्छद जल्दी-जल्दी खुलते हैं।
वस्तुनिष्ठ में जलीय जीव की साँस तेज़ है, धीमी नहीं। कारण घुली ऑक्सीजन की कमी है।
CBSE कूपिका की दीवार और रक्त के दो काम लिखवाता है: CO2 छोड़ना और O2 उठाना। अवशिष्ट आयतन भी लिखो।
10-सेकंड रिवीजन
प्रच्छद गलफड़-दरार को ढकता है।
जल गलफड़ों पर से गुजरता है और रक्त ऑक्सीजन ले लेता है।
गलत — घुली ऑक्सीजन कम है, इसलिए उनकी साँस तेज़ होती है।
दीवार पतली और रक्त से भरी।
इन थैलियों का नाम कूपिका है।
वक्ष गुहा बड़ी होती है।
मध्यपट चपटा होता है और पसलियाँ उठती हैं, इसलिए हवा अंदर आती है।
थोड़ी हवा सदा कूपिकाओं में रहती है, ताकि ऑक्सीजन के रक्त में जाने और कार्बन डाइऑक्साइड के बाहर आने के लिए समय मिल सके।
Haemoglobin and double circulation — Activity 5.7 · NCERT 5.4 · क्रियाकलाप 5.7
अपने मोहल्ले के स्वास्थ्य केंद्र पर मनुष्य में हीमोग्लोबिन की सामान्य सीमा पूछो। बच्चों और बड़ों में वह एक जैसी नहीं होती। स्त्रियों और पुरुषों में भी अंतर होता है। पशु चिकित्सालय में भैंस या गाय की सीमा पूछो। बछड़े, नर और मादा में भी अंतर मिलता है।
किताब संख्या छपवाकर नहीं देती। वह तुमसे स्थानीय आँकड़ा बनवाती है। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिकाओं में होता है और ऑक्सीजन से बहुत आसक्ति रखता है। इसकी कमी से कोशिकाओं तक ऑक्सीजन कम पहुँचती है और थकान होती है। अगर केवल विसरण होता तो फेफड़े से पैर के अँगूठे तक ऑक्सीजन को लगभग तीन वर्ष लगते।
हृदय मुट्ठी जितना पेशीय अंग है। फेफड़ों से ऑक्सीजनयुक्त रक्त बाएँ आलिंद में आता है, फिर बाएँ निलय में, और निलय उसे पूरे शरीर में धकेलता है। शरीर से विऑक्सीजनित रक्त दाएँ आलिंद में आता है, दाएँ निलय में जाता है, और निलय उसे फेफड़ों में भेजता है। निलय की दीवार मोटी है, क्योंकि उन्हें दूर तक धकेलना है। वाल्व रक्त को पीछे नहीं लौटने देते।
एक चक्र में रक्त हृदय से दो बार गुजरता है। यही दोहरा परिसंचरण है। मछली का हृदय दो कोष्ठ का है और रक्त एक बार गुजरता है। मेंढक जैसे जंतुओं का हृदय तीन कोष्ठ का होता है और कुछ रक्त मिल जाता है। पक्षी और स्तनधारी शरीर का ताप स्वयं बनाए रखते हैं, इसलिए उन्हें ऑक्सीजन की अलग और पूरी आपूर्ति चाहिए।
धमनियाँ हृदय से रक्त ले जाती हैं, दीवार मोटी और लचीली होती है। शिराएँ रक्त वापस लाती हैं और उनमें वाल्व होते हैं। केशिका की दीवार एक कोशिका मोटी होती है। प्लेटलेट्स चोट पर रक्त का थक्का बनाकर रिसाव रोकते हैं। सामान्य प्रकुंचन दाब लगभग 120 mm Hg और अनुशिथिलन दाब लगभग 80 mm Hg है। लसीका रंगहीन है, प्रोटीन कम है, और आँत से पची वसा ले जाती है।
प्रश्न: बायाँ निलय दाएँ निलय से अधिक पेशीय क्यों होता है?
उत्तर: बायाँ निलय रक्त को पूरे शरीर में धकेलता है। दायाँ निलय केवल फेफड़ों तक धकेलता है। दूर का मार्ग अधिक दाब माँगता है, इसलिए बाईं दीवार मोटी होती है।
वस्तुनिष्ठ में ऑक्सीजन लाल रक्त कणिका के हीमोग्लोबिन पर है। CO2 अधिकतर घुली हुई यात्रा करती है।
CBSE मछली, मेंढक और मनुष्य के हृदय की कोष्ठ-संख्या एक साथ पूछता है: 2, 3 और 4।
10-सेकंड रिवीजन
CO2 ज़्यादा घुलनशील है, ऑक्सीजन नहीं।
हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणिका में ऑक्सीजन बाँधकर ले जाता है।
गलत — क्रियाकलाप 5.7 यही अंतर पूछती है। बच्चों और बड़ों में भी सीमा अलग है।
इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं।
रक्त हृदय से दो बार गुजरता है। मछली में केवल एक बार।
अनुशिथिलन लगभग 80 है।
प्रकुंचन दाब लगभग 120 mm Hg और अनुशिथिलन लगभग 80 mm Hg है।
धमनियाँ हृदय से अंगों की ओर रक्त ले जाती हैं और उनकी दीवार मोटी होती है। शिराएँ रक्त हृदय की ओर लाती हैं, दीवार पतली होती है और वाल्व रक्त को एक ही दिशा में रखते हैं।
Transpiration and the nephron — Activity 5.8 · NCERT 5.4–5.5 · क्रियाकलाप 5.8
पौधे कम ऊर्जा से काम चलाते हैं, पर ऊँचे वृक्ष में दूरी बड़ी है। जाइलम जल और खनिज जड़ से पत्ती तक ले जाता है। जड़ के कोशिकाएँ आयन सक्रियता से लेती हैं, जल पीछे-पीछे घुसता है। यह जड़ दाब रात को अधिक मायने रखता है। दिन को असली खिंचाव वाष्पोत्सर्जन का है।
फ्लोएम प्रकाश-संश्लेषण के घुलनशील उत्पाद, अमीनो अम्ल और अन्य पदार्थ ले जाता है। यह दोनों दिशाओं में चलता है। सुक्रोज ATP की ऊर्जा से चालनी नलिका में जाता है, परासरण दाब बढ़ता है और जल अंदर आता है। वसंत में जड़ का संग्रह कलियों की ओर चढ़ता है।
एक ही माप के दो छोटे गमले लो, मिट्टी भी बराबर। एक में पौधा हो। दूसरे में पौधे जितनी ऊँची छड़ी गाड़ दो। दोनों की मिट्टी प्लास्टिक शीट से ढक दो, ताकि वाष्पन मिट्टी से न हो। फिर दोनों को प्लास्टिक से ढककर आधे घंटे तेज धूप में रखो।
पौधे वाले आवरण के अंदर पानी की बूँदें दिखती हैं। छड़ी वाले में नहीं। पत्ती से जलवाष्प का निकलना वाष्पोत्सर्जन है। यह जाइलम का जल ऊपर खींचता है, खनिज साथ लाता है और पत्ती को ठंडा रखता है।
मनुष्य में एक जोड़ी वृक्क, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय और मूत्रमार्ग होते हैं। नाइट्रोजनी अपशिष्ट, जैसे यूरिया, वृक्क में रक्त से अलग होता है। हर वृक्क में असंख्य नेफ्रॉन हैं। केशिकाओं का गुच्छा कप जैसे बोमन संपुट में छनित छोड़ता है।
शुरुआती छनित में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण और बहुत जल होता है। नली में ये चुनकर वापस रक्त में चले जाते हैं। जल की वापसी शरीर के अतिरिक्त जल और घुले अपशिष्ट पर निर्भर है। स्वस्थ वयस्क में छनित लगभग 180 लीटर प्रति दिन बनता है, मूत्र केवल एक-दो लीटर। कृत्रिम वृक्क में नली अर्धपारगम्य होती है और अपोहन द्रव में नाइट्रोजनी अपशिष्ट नहीं होता। वहाँ पुनरवशोषण नहीं होता।
पौधे अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन से छोड़ते हैं। अन्य अपशिष्ट रसधानी में, गिरती पत्तियों में, पुराने जाइलम में रेजिन और गोंद के रूप में, या आसपास की मिट्टी में छोड़ते हैं। प्रकाश-संश्लेषण की ऑक्सीजन भी एक अर्थ में अपशिष्ट है।
प्रश्न: 180 लीटर छनित से मूत्र एक-दो लीटर कैसे बचता है?
उत्तर: नेफ्रॉन की नली ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, उपयोगी लवण और अधिकतर जल को रक्त में लौटा देती है। यही पुनरवशोषण है। अपोहन में यह कदम नहीं होता, इसलिए कृत्रिम वृक्क केवल अपशिष्ट हटाता है, उपयोगी पदार्थ नहीं लौटाता।
वस्तुनिष्ठ में जल जाइलम का काम है, भोजन फ्लोएम का। दिशा भी याद रखो: जाइलम ऊपर, फ्लोएम दोनों ओर।
CBSE कूपिका और नेफ्रॉन की तुलना पूछता है। दोनों में पतली केशिकाएँ हैं। नेफ्रॉन में पुनरवशोषण अतिरिक्त कदम है।
10-सेकंड रिवीजन
वाष्प पत्ती से निकलती है।
बूँदें पौधे वाले आवरण पर बनती हैं। यही वाष्पोत्सर्जन है।
गलत — स्थानांतरण दोनों दिशाओं में होता है। वसंत में जड़ से कली की ओर भी।
बोमन संपुट इसी में है।
इस इकाई का नाम नेफ्रॉन है।
मूत्र इससे बहुत कम है।
छनित लगभग 180 लीटर है। मूत्र एक या दो लीटर बचता है।
गलत — कृत्रिम वृक्क अपशिष्ट निकालता है। पुनरवशोषण नहीं होता।
जाइलम जल और खनिज ले जाता है, फ्लोएम घुलनशील भोजन और अमीनो अम्ल। जाइलम की धारा मुख्यतः ऊपर है, फ्लोएम दोनों दिशाओं में। फ्लोएम ATP खर्च करता है। दिन को वाष्पोत्सर्जन खींचता है, रात को जड़ दाब अधिक उपयोगी है।
प्रकार चुनो। पाठों के 42 जाँच-प्रश्न अलग हैं — हर पाठ में जितने उसके विषय माँगते हैं। सब सही होने पर महारत ★ मिलती है।
कोई भी प्रश्न «सत्यापित PYQ» नहीं है। BSEB वाला सेट मॉडल अभ्यास है। CBSE वाले प्रश्न CBSE-शैली हैं, किसी वर्ष के पेपर की प्रति नहीं।
सोया पौधा भी जीवित है।
केवल दिखने वाली गति काफी नहीं है।
CO2 और जल से भोजन।
हरा पौधा स्वपोषी है।
रंग नीला-काला।
तनु आयोडीन मंड के साथ नीला-काला रंग देता है।
क्रियाकलाप 5.2।
काला कागज सूर्य का प्रकाश रोकता है।
अमीबा पाद बनाता है।
पैरामीशियम पक्ष्माभ का उपयोग करता है।
यकृत से।
पित्त वसा की बूँदें छोटी करता है।
ऊर्जा अधिक यहीं मिलती है।
वायवीय पथ माइटोकॉन्ड्रिया में है।
ऐंठन इसी से है।
लैक्टिक अम्ल बनता है।
क्रियाकलाप 5.6।
घुली ऑक्सीजन कम है, इसलिए साँस तेज़ है।
रक्त एक बार गुजरता है।
मछली का हृदय दो कोष्ठ का है।
प्रकुंचन 120।
अनुशिथिलन दाब लगभग 80 mm Hg है।
रंगहीन, प्रोटीन कम।
लसीका वसा ले जाती है।
रात को जड़ दाब।
दिन को वाष्पोत्सर्जन खींचता है।
छनित यहीं इकट्ठा होता है।
बोमन संपुट नेफ्रॉन में है।
सही — इसी कारण उन पर जीवित होने का विवाद है।
गलत — कई रात को CO2 लेकर मध्यवर्ती बनाते हैं।
सही — एंजाइम लार-एमिलेस है। नली A में नीला-काला रंग नहीं आता।
गलत — पित्त बूँदें छोटी करता है। एंजाइम लाइपेज है।
सही — ऑक्सीजन वाला पथ माइटोकॉन्ड्रिया में पूरा होता है।
गलत — CO2 अधिक घुलनशील है और अधिकतर घुली हुई चलती है। ऑक्सीजन हीमोग्लोबिन पर है।
सही — शिरा में दाब कम होता है।
गलत — द्रव का परासरण दाब रक्त जैसा है, पर नाइट्रोजनी अपशिष्ट नहीं होते।
पौधे मंड जमा करते हैं।
आयोडीन से नीला-काला।
इनका नाम द्वार कोशिका है।
फूलने पर छिद्र खुलता है।
सुरक्षा श्लेष्मा की है।
पेप्सिन नहीं।
ऊर्जा-मुद्रा ATP है।
30.5 kJ/mol।
छल्ले उपास्थि के हैं।
नली खुली रहती है।
प्लेटलेट्स थक्का बनाते हैं।
रक्त का रिसाव रोकने के लिए।
जल जाइलम में चढ़ता है।
भोजन फ्लोएम का काम है।
इसका नाम बोमन संपुट है।
छनित यहीं जमा होता है।
एमिलेस मंड, पेप्सिन प्रोटीन, लाइपेज वसा, पित्त पायस।
मंड, CO2, गलफड़, वाष्पोत्सर्जन।
अभिकथन (A): चितकबरी पत्ती का हरा भाग ही आयोडीन से नीला-काला होता है।
कारण (R): मंड वहीं बनता है जहाँ क्लोरोफिल होता है।
A और R दोनों सही हैं और R सही कारण है।
अभिकथन (A): छोटी आँत में पचे भोजन का अवशोषण रसांकुर बढ़ाते हैं।
कारण (R): रसांकुर आमाशय की जठर ग्रंथियाँ हैं।
A सही है। R गलत — रसांकुर छोटी आँत की अंगुली जैसी रचनाएँ हैं, जठर ग्रंथियाँ नहीं।
अभिकथन (A): वायवीय श्वसन में ऑक्सीजन लगती है।
कारण (R): इस मार्ग में ATP बन सकता है।
दोनों सही हैं। ATP अवायवीय मार्ग में भी बनता है, इसलिए R अकेले A की व्याख्या नहीं है।
अभिकथन (A): पक्षियों और स्तनधारियों में ऑक्सीजनयुक्त रक्त अलग रखा जाता है।
कारण (R): उन्हें शरीर का ताप बनाए रखने के लिए ऑक्सीजन की कुशल आपूर्ति चाहिए।
A और R दोनों सही हैं और R सही कारण है।
अभिकथन (A): अपोहन में ग्लूकोज का पुनरवशोषण हो जाता है।
कारण (R): नेफ्रॉन की नली उपयोगी पदार्थ रक्त में लौटाती है।
A गलत है — अपोहन में पुनरवशोषण नहीं होता। R सही है, यह नेफ्रॉन का काम है।
हरा पौधा स्वपोषी है। फफूँद और यीस्ट बाहर पचाते हैं। अमरबेल परजीवी है।
मोटी दीवार धमनी, वाल्व शिरा, एक-कोशिकीय दीवार केशिका।
वे प्रक्रियाएँ जो जीवित शरीर की मरम्मत और रखरखाव करती रहती हैं, जैव प्रक्रम कहलाती हैं।
पत्ती की सतह का सूक्ष्म छिद्र, जिसे द्वार कोशिकाएँ खोलती और बंद करती हैं।
आहार नाल की पेशियों का लयबद्ध सिकुड़ना, जो भोजन को आगे धकेलता है।
ATP पेशी सिकोड़ने, प्रोटीन बनाने या तंत्रिका आवेग में काम आता है। अंतिम फॉस्फेट टूटने पर लगभग 30.5 kJ/mol ऊर्जा मिलती है।
रात को रंध्र बंद रहते हैं और मूल दाब जल चढ़ाने में अधिक मायने रखता है। दिन को खुले रंध्रों से वाष्पोत्सर्जन मुख्य खिंचाव बन जाता है।
स्वपोषी CO2 और जल जैसे सरल पदार्थ लेते हैं, परपोषी जटिल भोजन। स्वपोषी को सूर्य की ऊर्जा और क्लोरोफिल चाहिए। परपोषी एंजाइम से भोजन तोड़ते हैं और सीधे या परोक्ष रूप से स्वपोषी पर निर्भर हैं।
छोटी आँत में पित्त बड़ी बूँदों को छोटी बूँदों में बाँटता है। अग्न्याशय का लाइपेज इन बूँदों को वसा अम्ल और ग्लिसरॉल की ओर तोड़ता है। आँत्र रस यह काम पूरा करता है।
पहले ग्लूकोज कोशिका द्रव्य में पायरुवेट बनता है। यीस्ट में पायरुवेट एथेनॉल और CO2 बनता है। ऑक्सीजन हो तो माइटोकॉन्ड्रिया में CO2 और जल बनते हैं। पेशी में ऑक्सीजन कम हो तो लैक्टिक अम्ल बनता है।
अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन से निकलता है। कुछ अपशिष्ट रसधानी में जमा होते हैं। कुछ गिरती पत्तियों के साथ चले जाते हैं। रेजिन और गोंद पुराने जाइलम में जमा होते हैं, और कुछ अपशिष्ट मिट्टी में छोड़ दिए जाते हैं।
क्लोरोफिल: चितकबरी पत्ती तीन दिन अँधेरे के बाद धूप में रखो, ऐल्कोहॉल में रंग उतारो और आयोडीन लगाओ। केवल हरा भाग नीला-काला होता है। धूप: उसी पत्ती का एक भाग काले कागज से ढक दो। ढका भाग नीला-काला नहीं होता। कार्बन डाइऑक्साइड: एक पौधे के जार में KOH रखो, जो CO2 सोख ले। उस पत्ती में मंड नहीं बनता, बिना KOH वाली में बनता है।
फेफड़े से ऑक्सीजनयुक्त रक्त बाएँ आलिंद में आता है, बाएँ निलय में जाता है और शरीर में पंप होता है। शरीर से विऑक्सीजनित रक्त दाएँ आलिंद और दाएँ निलय से फेफड़ों में जाता है। एक चक्र में रक्त हृदय से दो बार गुजरता है। इससे ऑक्सीजनयुक्त और विऑक्सीजनित रक्त नहीं मिलते। पक्षी और स्तनधारी शरीर का ताप बनाए रखते हैं, इसलिए उन्हें यह कुशल आपूर्ति चाहिए। मछली में रक्त हृदय से केवल एक बार गुजरता है।
नेफ्रॉन में केशिकाओं का गुच्छा और कप जैसा बोमन संपुट होता है। छनित में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण और जल होते हैं। नली इनमें से उपयोगी पदार्थ चुनकर रक्त में लौटाती है। यूरिया जैसा अपशिष्ट मूत्र में रह जाता है। प्रति दिन लगभग 180 L छनित बनता है और 1–2 L मूत्र। अपोहन में रक्त अर्धपारगम्य नली से गुजरता है और अपशिष्ट अपोहन द्रव में चले जाते हैं। पुनरवशोषण नहीं होता।
यह मॉडल सेट अभ्यास के लिए है। किसी वर्ष की वार्षिक परीक्षा का प्रश्न नहीं है। स्रोत पृष्ठ मिलने पर ही वार्षिक प्रश्न जोड़े जाएँगे।
मूत्र यहीं बनता है।
वृक्क उत्सर्जन तंत्र का अंग है।
फ्लोएम भोजन ले जाता है।
जाइलम जल और खनिज ले जाता है।
बाहर से कार्बन डाइऑक्साइड चाहिए।
रंध्र से अंदर आती है।
बैक्टीरिया शर्करा से अम्ल बनाते हैं और एनामेल नरम होता है। प्लाक लार को अम्ल तक नहीं पहुँचने देता। खाने के बाद ब्रश करने से प्लाक हट जाता है।
नाक के बाल और श्लेष्मा धूल रोकते हैं। उपास्थि के छल्ले मार्ग को खुला रखते हैं। नलिकाएँ कूपिकाओं में खत्म होती हैं। साँस लेते समय पसलियाँ उठती हैं और मध्यपट चपटा होता है। कूपिका की ऑक्सीजन रक्त की लाल कणिका में हीमोग्लोबिन पर चढ़ती है। कार्बन डाइऑक्साइड अधिकतर घुली हुई कूपिका में आती है।
ये योग्यता-आधारित अभ्यास प्रश्न हैं। किसी CBSE प्रश्नपत्र की प्रति नहीं हैं।
B नियंत्रण है।
A में मंड नहीं बचा, इसलिए लार ने उसे तोड़ा।
काला कागज धूप रोकता है।
ढके भाग में मंड नहीं बना, इसलिए धूप ज़रूरी है।
अभिकथन (A): साँस से निकली हवा पिचकारी की हवा से जल्दी चूने के पानी को दूधिया करती है।
कारण (R): साँस की हवा में कार्बन डाइऑक्साइड अधिक होती है।
A और R दोनों सही हैं और R सही कारण है।
अभिकथन (A): हीमोग्लोबिन की कमी से थकान हो सकती है।
कारण (R): हीमोग्लोबिन आँत में वसा पचाता है।
A सही है। R गलत — हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन ढोता है, वसा नहीं पचाता।
बूँदें मिट्टी के वाष्पन से नहीं बनीं, क्योंकि मिट्टी ढकी थी। जलवाष्प पौधे के वायवीय भाग से निकली। यही वाष्पोत्सर्जन है।
रक्त अर्धपारगम्य नलियों से गुजरता है। अपोहन द्रव में नाइट्रोजनी अपशिष्ट नहीं होते, इसलिए अपशिष्ट विसरण से द्रव में चले जाते हैं। नेफ्रॉन उपयोगी पदार्थ पुनरवशोषित करता है। अपोहन में यह कदम नहीं होता।
ऊपर «BSEB | CBSE» से बोर्ड बदलो। पाठ वही NCERT है।
इस पेज पर वार्षिक परीक्षा का सत्यापित प्रश्न नहीं है, क्योंकि स्रोत पृष्ठ नहीं जोड़ा गया। नीचे मॉडल सेट बोर्ड के पैटर्न पर अभ्यास के लिए है।
सत्यापित लेबल तभी लगेगा जब प्रश्न का स्रोत पृष्ठ उपलब्ध हो।
ये केस और अभिकथन-कारण अभ्यास हैं। इन्हें CBSE का पुराना प्रश्न मत समझो।
गलत प्रश्न जल्दी लौटते हैं, सही वाले कुछ दिन बाद।
आपने क्या सीखा
| क्या | याद रखने लायक |
|---|---|
| प्रकाश-संश्लेषण | 6CO2 + 6H2O → C6H12O6 + 6O2 |
| वायवीय श्वसन | C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O |
| यीस्ट किण्वन | C6H12O6 → 2C2H5OH + 2CO2 |
| ATP | एक फॉस्फेट टूटने पर 30.5 kJ/mol |
| रक्तचाप | लगभग 120 / 80 mm Hg |
| मूत्र | छनित लगभग 180 L, मूत्र 1–2 L प्रति दिन |
नोट्स मूल लेखन हैं। पाठ्यपुस्तक केवल क्रम और क्रियाकलाप-संख्या के लिए संदर्भ है। «सत्यापित» केवल स्रोत पृष्ठ वाले प्रश्न पर लिखा जाएगा।